पद्मश्री बाबूलाल दाहिया की देसी बीजों की खेती // Desi Kheti of The Babulal Dahiya
सतना जिले में देसी बीजों के संरक्षण में लगे बाबूलाल दाहिया और उनकी संस्था सर्जना सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच ने देसी बीजों की पारंपरिक खेती पर अनूठा काम किया है। परसमनिया पहाड़ के 30 गांव में देसी बीजों की पारंपरिक खेती को बढ़ावा दिया है। यहां वर्षा आधारित खेती है। मुख्य रूप से पौष्टिक अनाजों की खेती होती है। जिसमें कोदो, कुटकी, सांवा, काकुन, मक्का, ज्वार और बाजरा होता है। देसी धान भी बोते हैं, जिससे उन्हें कुछ नकदी राशि मिलती है, जो घरेलू खर्च के लिए काम आती है। बाबूलाल दाहिया मूल रूप से बघेली के कवि और साहित्यकार हैं। पेशे से पोस्ट मास्टर थे, अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सतना जिले के उचहेरा प्रखंड के पिथौराबाद गांव में रहते हैं। भारत सरकार ने उन्हें देसी बीजों के संरक्षण के लिए वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया है। उन्होंने उनकी संस्था का पंजीयन वर्ष 2003 में करवाया। बाबूलाल दाहिया की लोक साहित्य और संस्कृति में गहरी रूचि है। वे बताते हैं कि पहले लोकगीत, लोकोक्तियां, मुहावरें और लोक साहित्य का संकलन व सृजन करते थे। लेकिन जब उन्होंने यह महसूस किया कि ज्यादातर लोक साहित्य, मुहावरे व लोकोक्तियां लोक अनाजों पर हैं, तो लोक अनाजों को भी बचाना जरूरी है। पारंपरिक खेती और देसी बीजों को भी बचाना जरूरी है। और उससे जुड़े लोक साहित्य को भी। इसके बाद से वे लगातार उनकी संस्था सर्जना सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच के माध्यम से इस काम में जुटे हैं। सर्जना संस्था ने किसानों की बेहतरी के लिए कई प्रयास किए हैं। पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों को कार्यक्षेत्र बनाया है। पहाड़ी क्षेत्रों में महिला किसानों के माध्यम पारंपरिक खेती को बेहतर बनाने की कोशिश की है। महिला किसानों के स्वसहायता समूह बनाकर पारंपरिक खेती की है। वहां बीज बैंक बनाए हैं। जैव कीटनाशक व केंचुआ खाद बनवाई है। इससे एक तरफ तो देसी बीजों का संरक्षण हुआ है, सूखे के दौर में किसानों को बीज उपलब्ध हुए हैं, दूसरी तरफ किसानों की उपज को बाजार में अच्छे दामों में बिक्री करवाई है, जिससे कमाई का जरिया भी बना है। देखिए उनके काम पर बना यह वृत्तचित्र

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