घंटाकर्ण, घंडियाल देवता के पशुवा कुलबीर सजवान जी ने कहा की कैसे आया था देवता 🙏 #ghandiyal

र्ण देवता जो शायद उत्तराखंड के कण कण में कोई ही ऐसा स्थान हो जहाँ नहीं अवतरित हुए हो ।। हमारे उत्तराखंड ही नहीं अपितु देश विदेश में भी श्री घंटाकर्ण देवता की विशेष महत्ता हैं जो एक बार देवता से अपनी मनोकामना करता है देवता उसे जरूर पूरी करतें हैं। कौन है श्री घंटाकर्ण अर्थात घंडियाल देवता और क्या है देवता के अवतरण की कथा ।।। देवभूमि उत्तराखंड को पुराणों में भी एक विशेष दर्जा मिला है और यहां कण कण में देवी देवताओं का वास हैं , देवभूमि को पुराणों में केदार खण्ड यानी गढ़वाल और मानस खण्ड यानी कुमाऊँ कहाँ गया है ।। केदार खण्ड जहाँ शिव का वास स्थान और मानसखण्ड यानी शिव अर्धांगनी माँ नंदा (पार्वती) का ।।। दोनों ही खण्डों में जहाँ स्थान स्थान पर कोटि कोटि देवी देवताओं का वास है ऋषि मुनियों की तप स्थली हैं । वहीं गढ़वाल और कुमाऊँ में श्री घण्टाकर्ण समान रूप से पूजा अर्चना की जाती हैं। श्री घंडियाल देवता को पांडवों का वंशज कहा जाता है और घण्टाकर्ण महादेव के रूप में पूजा जाता है ।। श्री घण्टाकर्ण देवता श्री बद्रीनाथ जी के क्षेत्रपाल के रूप में विराजमान हैं।। श्री घंडियाल देवता पर आधारित ग्रन्थ घण्टाकर्ण सार एवम घण्टाकर्णकल्प नामक ग्रंथ कोलकाता एवम पटना में अभी भी संग्रहालय में मौजूद हैं।। असम में भी घण्टाकर्ण देवता का मंदिर है जो माँ कामाख्या देवी के मंदिर के निकट ही हैं।। घण्टाकर्ण देवता को हिन्दू , जैन , एवंम बौद्ध धर्म मे भी पूजा जाता हैं। क्या है श्री घण्टाकर्ण देवता की कहानी ??? यूँ तो प्रत्येक धर्म एवम स्थान पर अलग अलग कहानियां प्रचलित हैं पर यह कथा गढ़वाल छेत्र से संबंधित है।। महाभारत युद्ध से और अर्जुन सुभद्रा के पुत्र की कहानी।। महाभारत युद्ध के बारे में हम सभी जानते हैं।। श्री घण्टाकर्ण देवता का सीधा संबंध महाभारत की चक्रव्यूह की घटना से जुड़ा हुआ है ।। महाभारत युद्ध में जब कौरवों द्वारा चक्रव्यूह की रचना की गई थी और अर्जुन श्री कृष्ण के साथ युद्धभूमि से दूर थे तब पांडव सेना में कोई भी ऐसा महारथी मौजूद नहीं था जो चक्रव्यूह का भेदन कर सके पांडव युद्ध में हार की कगार पर पहुंच चुके थे तब एक सोलह वर्ष के वीर अर्जुन सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ने अपने पराक्रम से कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया था । बड़े बड़े महारथी इस वीर के आगे नतमस्तक थे अंत में जब कोई भी अभिमन्यु का सामना नहीं कर पा रहा था और कौरवों को अपनी योजना युधिष्ठिर को बंदी बनाने की असफल होती नजर आरही थी तब पुनः दुष्ट सकुनी की कुटिल योजना पांडवो से संधि करने के बहाने वीर अभिमन्यु को अपने झांसे में लेकर एक साथ निहत्था करके आक्रमण करने की सफल हो गयी ।। वीर अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त हुए ।।। वीर अभिमन्यु की वीरगति के उपरांत अभिमन्यु राक्षस योनी में विचरण करने लगे जो विष्णु को अपना परम शत्रु मानते थे इसका कारण यह था कि अन्तर्यामी भगवान श्री कृष्ण जी चक्रव्यूह की घटना को जानते हुए भी अर्जुन को रणभूमि से दूर ले जाते हैं और वहीं अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त होते हैं। विष्णु के नाम से वैर रखने के कारण उस राक्षस योनि ने अपने कानों में विशाल घंटियों को धारण कर लिया ताकि उनकी ध्वनि के सामने उन्हें विष्णु का नाम उनके कानों में भी सुनाई नहीं दे। श्री घण्टाकर्ण शिव के परम भक्त थे और राक्षस योनि से मुक्ति के लिये घण्टाकर्ण ने महादेव की कठिन तपस्या की थी । तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने घण्टाकर्ण देवता को उनकी मुक्ति का मार्ग बताया।। भगवान शिव ने घण्टाकर्ण से कहाँ उनकी राक्षस योनि से मुक्ति केवल श्री विष्णु भगवान ही कर सकतें है।। उसके पश्चात श्री घण्टाकर्ण विष्णु की खोज में श्री बद्री धाम पहुंच जाते हैं जहाँ उनकी भेंट नारद जी से होती है नारद जी को अपना सारा वृतांत सुनाने के पश्चात नारदमुनि जी से विनती करते है कि वह श्री विष्णु जी से उनकी मुक्ति का आग्रह करें।। नारद जी तब बैकुंठ जा कर श्री विष्णु जी से घण्टाकर्ण की मुक्ति का निवेदन करते हैं भक्तवत्सल भगवान अपने भक्त की बात भला कैसे टालते ।। तब श्री विष्णु जी अपने सुदर्शन चक्र से घण्टाकर्ण की राक्षस योनि का अंत करते हैं और उन्हें बद्रीनाथ जी का क्षेत्रपाल नियुक्त करके इंद्रप्रस्थ भेज देते हैं जहाँ सभी देवता भगवान शिव एवम माँ पार्वती उस समय वास करते थे।। कानों में घंटी धारण करने के कारण श्री नारायण भगवान उन्हें घण्टाकर्ण नाम प्रदान करते हैं ।। शिव के परम भक्त होने के कारण घण्टाकर्ण देवता को घण्टाकर्ण महादेव भी कहा जाता है कैसे देवभूमि के जगह जगह घण्टाकर्ण का वास हुआ ??? इंद्रप्रस्थ यानी दिल्ली में जब मुगलों ने आक्रमण कर गायों का वध किया एवम हिन्दू देवी देवताओं के मंदिरों संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया तब सभी देवी देवताओं सहित घण्टाकर्ण देवता भी एक देवभूमि आ पहुंचे ।। नारायण के सर्वप्रथम पृथ्वी पर चरण स्पर्श स्थान हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद घण्टाकर्ण देवता देवभूमि में किसी स्थान की तलाश में एक वृद्ध का रूप धारण कर ऋषिकेश में बैठ जाते हैं जहाँ से उस समय पहाड़ी लोग अपने सामान को बेच कर अपनी जरूरत का सामान नमक इत्यादि ले जाते थे जिन्हें ढाकरी कहा जाता था ।। रास्ते में बैठे भगवान सभी से उन्हें कंडी में बिठाकर अपने साथ ले जाने की बात करते हैं किंतु सभी अपने बोझ के साथ उन्हें ले जाने में असमर्थता जताते हैं। तब एक अधेड़ व्यक्ति सजवाण द्वारा उन्हें अपने सामान के साथ कंडी के ऊपर बिठाया जाता हैं घण्टाकर्ण कि कृपा से उस व्यक्ति का बोझ फूल के समान हो जाता हैं जब वह व्यक्ति अपने गांव के नजदीक बैठ कर तम्बाकू पीने के लिए अपना बोझ एवम देवता को उतरता है तब देवता उसी स्थान पर अंतरध्यान हो जाते हैं ।। बहुत ढूंढने के पश्चात देवता उस व्यक्ति को नही मिलते है । संध्या होने पर वह व्यक्ति अपने घर लौट आता है रात में स्वपन में आकर देवता अपना परिचय देते है और अपना मंदिर बनाने की बात कहते है । बाकि दूसरे पार्ट में

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घंडियाल देवता की कहानी। #pahadisanskriti #devotional #treval #story #devbhoomi
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Mussoorie शराब की मदहोशी में युवती का हाई वोल्टेज ड्रामा | Viral Video | Police | Uttarakhand News
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