एक मात्र मंदिर जहाँ होता है, माँ महाकाली के संपूर्ण मुखमण्डल का दर्शन | पाटन | गुजरात | दर्शन 🙏

श्रेय: लेखक: रमन द्विवेदी भक्तों नमस्कार! प्रणाम! और बहुत बहुत अभिनन्दन! भक्तों आज हम आपको अपने लोकप्रिय कार्यक्रम दर्शन के माध्यम से एक ऐसे प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर की यात्रा करवाने जा रहे हैं! जो देखने में कोई पारंपरिक मंदिर नहीं अपितु किसी राजा महाराजा का गढ़ यानि दुर्ग दिखाई पड़ता है। भक्तों हम बात कर रहे हैं पाटन स्थित महाकाली मंदिर की। मंदिर के बारे में: भक्तो महाकाली मंदिर गुजरात के पाटन जिले के पटोला हेरिटेज म्यूजियम देव कुटीर के पास सामलपती में स्थित है। इस मंदिर के गर्भगृह में माता महाकाली की स्वयंभू मूर्ति विराजमान है। कहा जाता है कि गुजरात के परम प्रतापी राजा सिद्धराज जयसिंह ने अपनी कुलदेवी माता महाकाली को प्रसन्न करने हेतु कठोर साधना की। उनकी साधना से प्रसन्न होकर माता महाकाली प्रकट हुई थी। माता महाकाली पाटन की नगरदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। यह मंदिर करोड़ों देवी भक्तो की आस्था का केन्द्र्विंदु बना है। मंदिर का इतिहास: भक्तों पाटन का महाकाली मंदिर लगभग 900 वर्ष पुराना है। इस मंदिर का निर्माण यहाँ के तत्कालीन परम प्रतापी सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह के शासनकाल में हुआ। पाटन में सिद्धराज जयसिंह का शासन विक्रम संवत 1094 से 1143 तक रहा। इसी अवधि यानि विक्रम संवत 1123 में माता काली का मंदिर बना। बताया जाता है कि सोलंकी राजाओं की कुलदेवी उज्जैन में विराजमान कालिका माता हैं। एक बार सिद्धराज जयसिंह की उज्जैन जाकर अपनी इष्ट देवी की पूजा आराधना करने की मंशा हुई। लेकिन मंदिर मालवा में होने के कारण सिद्धराज जयसिंह की इच्छा की पूर्णता मालवा के राजा यशोवर्मा की दया पर निर्भर थी। इसलिए सिद्धराज जयसिंह ने मालवा में आक्रमण कर दिया और मालवा की राजधानी पर विजय प्राप्त करते हुए मालवा के राजा यशोवर्मा को बंदी बना लिया। भक्तों मालवा के राजा यशोवर्मा को बंदी बनाने के बाद राजा सिद्धराज जयसिंह ने अपनी कुलदेवी कालिका माताजी की कठोर साधना की। राजा की साधना से प्रसन्न होकर माता महाकाली प्रकट हो गयीं। उन्होंने राजा सिद्धराज जयसिंह से वरदान मांगने को कहा। तब राजा जयसिंह ने माता जी से पाटन पधारने का भावपूर्ण आग्रह किया। राजा आग्रह पर माता महाकाली ने मुस्कराते हुए कहा कि 'मैं गढ़कालिका हूं, मुझे गढ़ अर्थात किला चाहिए”। राजा सिद्धराज जयसिंह ने पाटन लौटकर गढ़ का निर्माण करवाया। गढ़ निर्मित होते ही वहां माता महाकाली का स्वयंभू मुखारविन्द प्रकट हो गया। वही स्वयंभू मुखारविन्द पाटन के गढ़ रुपी महाकाली मंदिर में विराजमान है। महाकाली माता सम्पूर्ण मुखमंडल का दर्शन: भक्तों समूचे भारत में एक मात्र यही मंदिर है जिसमें महाकाली माता के सम्पूर्ण मुखमंडल का दर्शन होता है। जबकि कोलकाता के कालीघाट में विराजमान माता महाकाली के नथुनों यानी नाक का दर्शन होता है, पावागढ़ में कालिका माता के नेत्रों का दर्शन तथा उज्जैन में विराजमान गढ़कालिका मंदिर में माँ के अधूरे मुखारविन्द का दर्शन होता है। माता महाकाली मंदिर में विराजमान अन्य देवियां: इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि यहां कालिका माताजी के पास अठारह भुजाओं वाली भद्रकाली माताजी भी विराजमान हैं। यहाँ उज्ज्वल मुखमंडल और दिव्य मुस्कान वाली जो तीसरी देवी प्रतिष्ठित हैं, उनका वर्णन माता महालक्ष्मी के रूप में किया गया है। विक्रम संवत 1433 में यहाँ क्षेमंकरी माताजी प्रकट हुईं। जो माता महालक्ष्मी के बगल में विराजमान हैं। क्षेमंकरी के बगल में माता महिषासुरमर्दिनी पधारी हैं। यहां चैत्री और असो नवरात्रि एवं दिवाली के सभी त्योहार धूमधाम से मनाए जाते हैं। एक लोक मेला भी यहाँ आयोजित किया जाता है और पाटन की सभी जातियों द्वारा अलग-अलग तारीखों पर पूरे साल होमा-हवन और समारोह आयोजित किए जाते हैं। असो मास की दुर्गाष्टमी पर संधि पूजा और काली चौदश को काली पूजा का यहां विशेष महत्व है। माताजी पाटन से भीनमाल गईं: भक्तों मान्यता है कि पाटन से माताजी भीनमाल चली गईं। जो आज पूरे राजस्थान में खिमाज माता के रूप में पूजी जाती हैं। महान तीर्थ है पाटन: भक्तों सिद्धराज के शासनकाल में राजगुरु श्री केशव माधव व्यास द्वारा रचित सरस्वती पुराण में कहा गया है कि पाटन एक पवित्र और महँ तीर्थ है जहाँ माँ आद्या, महालक्ष्मी और महाकाली आदि देवियों का साक्षात् व शाश्वत निवास है। सिद्धराज जयसिंह इतिहास: भक्तों गुजरात के इतिहास की जब भी बात की जाती है तो उसमे एक वंश के योगदान को जरूर याद किया जाता हे और उस वंश का नाम है सोलंकी वंश। इस वंश में रानी मीनलदेवी और राजा सिद्धराज जयसिंह ने गुजरात के राज्य का ऐसा विकास किया कि वो समय गुजरात के इतिहास का स्वर्णिम काल बनकर अमर हो गया। भक्तों राजा सिद्धराज जयसिंह का जन्म गुजरात के पालनपुर शहर में हुआ था। जो आज के समय में उत्तर गुजरात के बनासकांठा जिले में है। उसकी माता का नाम मीनलदेवी और पिता का नाम कर्णदेव सोलंकी था। सिद्धराज जयसिंह के जन्म होने के थोड़े समय बाद ही उसके पिता कर्णदेव सोलंकी का मालवा के राजा के साथ युद्ध करते हुए निधन हो गया था। उस समय सिद्धराज जयसिंह की उम्र केवल 3 वर्ष थी। राजा कर्णदेव सोलंकी की मृत्यु के बाद राज्य के कुछ जाने माने लोग विद्रोह करने लगे थे। ऐसे में सिद्धराज जयसिंह की माता ने महज 3 वर्ष की उम्र में उसका राज्यभिषेक किया और सिद्धराज के बड़ा होने तक पाटन की गद्दी को स्वयं संभालने का प्रयास किया। यद्यपि पाटन के कई लोगो ने मीनलदेवी के शासक बनने का विरोध किया। लेकिन वह अपनी बुद्धिमत्ता और चतुराई से विद्रोह को शांत करने में सफल रही। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि तिलक किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. #devotional #hinduism #mahakalimandirpatan #gujrat #4K #travel

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