खल्लारी माता मंदिर महासमुंद | Khallari Mata Mandir | Chhattisgarh | Rajendrakumarvlog
खल्लारी माता मंदिर महासमुंद | Khallari Mata Mandir | Chhattisgarh | Rajendrakumarvlog #khallarimatamandir #khallarimata #rajendrakumarvlog #chhattisgarh #bhimkhoj #mahasamund 1985 में पहली बार ज्योत प्रज्जवलित कर बनाया गया था मंदिर, तब से नवरात्रि में जलते हैं ज्योत, खल्लारी का खूबसूरत मंदिर छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर खल्लारी पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है. प्राचीन काल में इस स्थान को खलवाटिका के नाम से जाना जाता था. बता दें कि माता के दर्शन के लिए भक्तों को करीब 850 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है, लेकिन अब लोगों के सुविधा के लिए रोप- वे लगाया जा चुका है |अब रोप वे माध्यम से लोग माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं. यहां श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए दूर-दूर से माता के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं. ऐसा माना जाता है कि जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं वह संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए ना सिर्फ माता के दर्शन करती हैं बल्कि यहां पर मनोकामना ज्योति प्रज्वलित कर जाते हैं |खल्लारी माता मंदिर में हर साल शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. नवरात्रि के दिनों में मंदिर में माता के दर्शन के लिए आसपास के भक्तों के साथ ही दूसरे राज्यों से भी लगभग 30 से 35 हजार श्रद्धालु हर रोज पहुंचते हैं. चैत पूर्णिमा के दिन खल्लारी में मेला महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें लोग लाखों की संख्या में पहुंचते हैं.हिंदू धर्म में नवरात्र के समय को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है और माता के निमित्त उपवास भी रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के समय में पूरे विधि-विधान के साथ देवी के नौ रूपों की पूजा करने से व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है। साथ ही माता रानी की कृपा से साधक को मनोवांछित फल प्राप्त होता है। छत्तीसगढ़ के प्राचीन एवं ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है 'खल्लारी' इसका उल्लेख द्वापर युग से होता आ रहा है। द्वापर युग में हिडिम्ब नायक राक्षस का राज्य था जिसकी राजधानी सिरपुर थी हिडिम्ब ने एक वाटिका खल्लारी में बनवाया था जहां समय-समय में वह घुमने आता था इसी वाटिका के कारण इस स्थान का नाम खल्लवाटिका अर्थात राक्षस की वाटिका के रूप में जाना जाता था हिडिम्ब की बहन हिडिम्बनी थी जो अपने भाई के साथ वाटिका घुमने आती थी और इस स्थान में स्थित देवीशक्ति की पूजा अर्चना करती थी। द्वापर युग में ही पांडव अपना राज्य छोड़कर 12 वर्ष का निर्वासन कर रहे थे इसी निर्वासनकाल में पांडव इस क्षेत्र से गुजरे, महाराज धृटराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन, शकुनी और अन्य कॉरवों ने मिलकर पांडवों की हत्या करने के लिए षड़यंत्र रचा था इस षडयंत्र के अंतर्गत उन सभी ने मिलकर लाख और मांश आदि से लाक्षागृह बनाया और उसमें आग लगा दी परंतु पाण्डव ने गुप्त मार्ग से निकलकर दक्षिण की ओर इसी जगह में भटकते-भटकते पहुंचे और स्वयं को सुरक्षित महसुस कर कुछ देर इसी जगह पहाड़ में विश्राम करने का निर्णय लिया तभी राक्षसों के राजा हिडिम्ब ने मनुष्य की गंध महसुस कर लिया और हिडिम्ब ने अपनी बहन हिडिम्बनी को बुलाया और उसे उन सभी मनुष्यों को अपने निवास स्थान तक लाने का काम सौंपा जब राक्षसी हिडिम्बनी पांडवों के पास पहुंची तो देखा कि सभी पांडव तो विश्राम कर रहे थे परंतु उनमें से एक जागकर पहरा दे रहा था वे पांडु पुत्र भीम थे राक्षसी हिडिम्बनी ने उसे देखते ही उन पर मंत्र मुग्ध हो गई और उनसे प्रेम करने लगी और सुंदर सा रूप धारण कर उनके समीप जाकर उसे विवाह करने का प्रस्ताव रखी परंतु हिडिम्बनी को अपने भाई के समान ही अत्यंत बलशाली वर चाहिये था इस के लिए उसने भीम की परीक्षा ली और भीम ने अपनी वीरता का परिचय खल्लारी पहाड़ी के ऊपर चट्टान में दिया, भीम ने अपना पैर चट्टान पर पुरी शक्ति के साथ दबाया जहां-जहां पैर पर बल दिया गया वहां-वहां उसका पैर चट्टान पर धस गया। इस दृश्य को देखकर हिडिम्बनी प्रसन्न हो गई इधर हिडिम्ब देर होने के कारण अपनी बहन को ढूंढ़ते- ढूंढ़ते वहां पर पहुंचा तो देखा कि उसकी बहन पांडव के साथ है। इस मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में किया गया था और इसका इतिहास बहुत ही गहरा और समृद्ध है। मंदिर का इतिहास और महत्व: • धार्मिक महत्व : खल्लारी मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और यहाँ पर भक्तों की बड़ी संख्या में पूजा-अर्चना होती है। मंदिर का स्थानिक लोगों के लिए गहन महत्व है और यहाँ पर विभिन्न धार्मिक उत्सव और मेले आयोजित होते हैं। • स्थापत्य और वास्तुकला : मंदिर का स्थापत्य और वास्तुकला प्राचीन है और इसमें स्थापत्यकला के उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलते हैं। इसकी दीवारों पर चित्रित कलात्मक अंतःप्रावेश, विष्णु और उसकी अनेक अवतारों की मूर्तियाँ देखी जा सकती हैं। • ऐतिहासिक महत्व : इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों के साथ जुड़ा है। कई राजा-महाराजा ने इसे पुनर्निर्माण करवाया और इसकी सुरक्षा और विकास में योगदान दिया है। • सांस्कृतिक संपदा : यह मंदिर स्थानीय लोकसंस्कृति और परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यहाँ पर लोग अपनी पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों को अपनाते हैं। खल्लारी मंदिर न केवल धार्मिक महत्व का एक प्रतीक है, बल्कि इसका इतिहास भी राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है। Please subscribe my YouTube channel RAJENDRA KUMAR VLOG & thanks for watching this video I hope you enjoy it. You can follow me in INSTAGRAM- / rajendrakumarvlog FACEBOOK- / rajendrakumarvlog Thanks to all for support & love. ☺ RAJENDRA KUMAR VLOG

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