Skand 10 Adhyay 78 | श्रीमद्भागवत महापुराण | दन्तवक्त्र-विदूरथ वध और बलराम जी द्वारा रोमहर्षण सूत वध
📜 Shrimad Bhagwat Mahapuran | Skandha 10, Chapter 78 | Slaying of Dantavakra & Viduratha and Balarama's Pilgrimage इस अध्याय में शाल्व के मित्र दन्तवक्त्र और उसके भाई विदूरथ का भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा वध (जिससे 'जय-विजय' के शाप का तीसरा और अंतिम जन्म पूर्ण हुआ), तथा दाऊ भैया (बलराम जी) का महाभारत युद्ध में पक्षपात से बचने के लिए तीर्थयात्रा पर जाना और नैमिषारण्य में व्यासपीठ के अहंकार में चूर 'रोमहर्षण सूत' का कुशा से वध करने का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग वर्णित है। शाल्व की मृत्यु के पश्चात् उसका मित्र करुष देश का राजा 'दन्तवक्त्र' (जो पूर्व जन्म में वैकुंठ का द्वारपाल 'विजय' था) गदा लेकर पैदल ही श्रीकृष्ण से युद्ध करने आ गया। श्रीकृष्ण ने अपनी 'कौमोदकी' गदा से उसकी छाती पर ऐसा प्रहार किया कि वह रक्त उगलते हुए धरती पर गिर पड़ा। शिशुपाल की भाँति उसके शरीर से भी एक दिव्य ज्योति निकलकर भगवान् में विलीन हो गई। इसके बाद दन्तवक्त्र का भाई 'विदूरथ' बदला लेने आया, किन्तु भगवान् ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर भी काट दिया। इस प्रकार शिशुपाल और दन्तवक्त्र के वध के साथ ही जय-विजय का शाप समाप्त हुआ। इधर महाभारत का युद्ध निकट आ रहा था। बलराम जी न तो पाण्डवों के विरुद्ध लड़ना चाहते थे और न ही दुर्योधन के (क्योंकि दुर्योधन उनका शिष्य था)। अतः वे तीर्थयात्रा पर निकल गए। भ्रमण करते हुए वे 'नैमिषारण्य' पहुँचे, जहाँ शौनक आदि ऋषि दीर्घकालीन यज्ञ कर रहे थे। बलराम जी को देखकर सभी ऋषि सम्मान में खड़े हो गए, किन्तु व्यासपीठ पर बैठे 'रोमहर्षण सूत' (सूतजी) अपने अहंकारवश न तो खड़े हुए और न ही प्रणाम किया। यह देखकर बलराम जी को क्रोध आ गया कि जो व्यक्ति धर्म की कथा सुनाता है, यदि उसमें विनय नहीं है तो उसकी विद्या व्यर्थ है। उन्होंने हाथ में लिए हुए एक 'कुशा' (घास के तिनके) से ही रोमहर्षण सूत का वध कर दिया। ऋषियों ने दुखी होकर बताया कि उन्होंने ही सूतजी को 'ब्रह्म-आसन' (व्यासपीठ) पर बिठाया था, अतः बलराम जी को 'ब्रह्महत्या' का पाप लगा है। बलराम जी ने ऋषियों के निर्देशानुसार प्रायश्चित करना स्वीकार किया और रोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा को कथावाचक के पद पर स्थापित कर उसे दीर्घायु का वरदान दिया। 🔲 इस अध्याय के मुख्य बिंदु: दन्तवक्त्र वध: शाल्व के मित्र दन्तवक्त्र का पैदल युद्ध करना और श्रीकृष्ण की गदा से उसका अंत होना। विदूरथ वध: भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने आए विदूरथ का सुदर्शन चक्र से वध। जय-विजय का शाप मुक्त होना: तीसरे जन्म में शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में जय-विजय का भगवान् में विलीन होना और वैकुंठ लौटना। बलराम जी की तीर्थयात्रा: महाभारत युद्ध से विरक्त होकर दाऊ भैया का शांति की खोज में तीर्थों की ओर प्रस्थान। नैमिषारण्य में प्रवेश: शौनक आदि ऋषियों के यज्ञ में बलराम जी का पहुँचना और सबका सम्मान प्राप्त करना। रोमहर्षण सूत का वध: व्यासपीठ के अहंकार में बैठे सूतजी का बलराम जी द्वारा केवल एक कुशा के तिनके से वध कर देना। प्रायश्चित का संकल्प: ऋषियों के कहने पर बलराम जी का ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए प्रायश्चित का व्रत लेना और उग्रश्रवा को व्यासपीठ सौंपना। ✨ सार: दन्तवक्त्र के वध के साथ भगवान् ने अपने द्वारपालों (जय-विजय) को दिए गए तीन जन्मों के शाप से मुक्त कर उन्हें पुनः वैकुंठ बुला लिया। दूसरी ओर, रोमहर्षण सूत का प्रसंग एक बहुत बड़ी चेतावनी है कि चाहे कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा ज्ञानी या कथावाचक क्यों न हो, यदि उसे अपने पद या विद्या का अहंकार हो जाए और वह महापुरुषों का सम्मान करना भूल जाए, तो उसकी वह विद्या उसी के पतन का कारण बन जाती है। 🎙️ Narrated by: Pandit Dr. Kashinath Mishra Ji 📜 Presented by: Pandit Dr. Kashinath Mishra Ji 📖 फ़ॉर्मेट (Format): Shuddh Sanskrit recitation Line-by-line Hindi explanation Emotional visuals to bring ras and context Designed for both shravan and adhyayan 🔔 Subscribe for the next chapters: @panditkashinathmishraji 🌐 वेबसाइट (Website): https://www.bhavishyamalika.com queries: Shrimad Bhagwat Mahapuran Skandha 10 Adhyay 78 explanation Dantavakra Vadh by Lord Krishna story Why did Balarama kill Romaharshana Suta Ji Balarama goes on Tirtha Yatra during Mahabharata Pandit Dr Kashinath Mishra Bhagwat Katha Skandha 10 Adhyay 78 hashtags: #panditkashinathmishraji #shreemadbhagawat #bhagwatkatha #bhagwatkathalive #krishnaleela #dantavakravadh #balaram #naimisharanya

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